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' छपास रोग '

>> Friday, July 10, 2009


9 comments:

संगीता पुरी July 10, 2009 at 7:14 AM  

पौधे लगाने की भी जरूरत न थी .. फोटो तो सिर्फ बैनर तले ही खिंच जाती !!

श्यामल सुमन July 10, 2009 at 8:08 AM  

सरोजिनी प्रीतम जी की पंक्तियाँ याद आयीं-

एक हलवाई की बेटी वृक्षारोपण कार्यक्रम में जाती है।
वे पेड़ों की बात बताते हैं वो पेड़ों की समझ जाती है।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Udan Tashtari July 10, 2009 at 9:27 AM  

पीड़ा जायज है.

ओम आर्य July 10, 2009 at 7:56 PM  

बिल्कुल यही सच है .............हर एक चीज आप्ने जगह से विचलित है अपने जगह से ................वाह वाह

Mahesh Sinha July 11, 2009 at 7:54 AM  

ये रोग बड़ा है मस्त मस्त

काजल कुमार Kajal Kumar July 12, 2009 at 6:55 AM  

इन्हें ब्लाग बनवा कर दे दो

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