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नया किराएदार (लघु कथा)

>> Wednesday, July 14, 2010

वैसे तो हमने सोचा था कि प्राईवेट जॉब वाले को मकान नहीं देंगे...पर आप भले आदमी लगते हैं...चलिए ठीक है, हम तैयार हैं, तो कब आ रहे हैं सामान लेकर.? मकान मालिक ने कहा..मकान मालकिन हैरान थीं कि पतिदेव तो ठान चुके थे कि सरकारी कर्मचारी को ही किराए पर देंगे, फिर अब क्या हुआ..? न तीन महीने का एडवांस मांगा, न कोई किराए के अनुबंध की बात की, उसे क्या पता था कि नए किराएदार की टूरिंग जॉब और उसकी दो जवान खूबसूरत बेटियों को देखकर मकान मालिक ने ये फैसला लिया था ।

11 comments:

जी.के. अवधिया July 14, 2010 11:18 PM  

यह लघुकथा नहीं बल्कि आज के समाज की वास्तविकता है!

narottam July 15, 2010 1:41 AM  

अच्छी लघु कथा...

narottam July 15, 2010 1:49 AM  

कमी नहीं है...कमीनों की

kajal July 15, 2010 1:51 AM  

बड़ी विडम्बना है...

राजकुमार सोनी July 15, 2010 1:56 AM  

इस पोस्ट को तो टाप पर होना चाहिए था.
लीजिए अभी टाप पर पहुंचाता हूं.

राजकुमार सोनी July 15, 2010 1:56 AM  

बहुत ही करारा व्यंग्य मारा है आपने.

राजकुमार सोनी July 15, 2010 1:57 AM  

इसी तरह लिखते रहे..
लघुकथा के क्षेत्र में जल्द से जल्द बनाए अपना मुकाम

ajay saxena July 15, 2010 1:59 AM  

यूं तो लघु कथा लिखने का बड़ा शौक है..पर पहली बार अपने ब्लाग में पोस्ट के रूप में लिखी ..अब लिखता रहुंगा...शायद धीरे-धीरे थोड़ा बेहतर लिख सकुं....सभी साथयों का आभार..

Apanatva July 19, 2010 4:28 AM  

becharee patnee............ apane pati kee soch se anbhigy.......

खबरों की दुनियाँ July 31, 2010 9:39 PM  

धन्य हैं आप । धन्य-धन्य हुआ ऐसी अतिरोचक-कलियुगी कथा सुनकर ।

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